“Корабль-призрак” с мертвецами прибило к берегам Японии

Пять человеческих тел и две головы нашли в небольшом судне, прибитом волнами к берегам Японии. Предположительно, это северокорейские рыбаки или беженцы.

Лодка, найденная на острове Садо, сильно повреждена, на ее борту надписи на корейском языке. Судя по всему, она долго находилась в море: трупы частично истлели.

Береговая охрана смогла добраться до лодки только через сутки после того, как она была обнаружена в субботу. В японской полиции пока не могут наверняка сказать, принадлежали ли головы кому-то из погибших на корабле.

Такие “корабли-призраки” уже не раз находили у японских берегов. Чаще всего это небольшие рыболовные суда из КНДР.

Большую часть таких лодок находят пустыми или с телами на борту. Судя по всему, рыбаки заходят слишком далеко в море в поисках улова и либо теряются и гибнут – либо от голода, либо при сильном шторме.

В 2017 году деревянную лодку с восемью живыми пассажирами прибило к японскому берегу в районе города Юрихондзё.

Один из них объяснил, что на лодке действительно рыбаки из Северной Кореи, которые занимались ловлей кальмара. Из-за возникших в море проблем лодку отнесло в японские территориальные воды.

Ранее выдвигались предположения, что на лодках пытаются бежать из КНДР, но эти версии подтверждения не нашли. Найденные в 2017 году рыбаки потребовали, чтобы их переправили обратно в КНДР.

Из-за напряженных отношений между КНДР и Японией эффективно расследовать подобные случаи почти невозможно.

Жители Северной Кореи рыбачат и в российских водах.

В сентябре 2019 года погранслужба ФСБ задержала два судна и более 160 граждан КНДР в исключительной экономической зоне России в Японском море.

Пять человеческих тел и две головы нашли в небольшом судне, прибитом волнами к берегам Японии. Предположительно, это северокорейские рыбаки или беженцы.

Лодка, найденная на острове Садо, сильно повреждена, на ее борту надписи на корейском языке. Судя по всему, она долго находилась в море: трупы частично истлели.

Береговая охрана смогла добраться до лодки только через сутки после того, как она была обнаружена в субботу. В японской полиции пока не могут наверняка сказать, принадлежали ли головы кому-то из погибших на корабле.

Такие “корабли-призраки” уже не раз находили у японских берегов. Чаще всего это небольшие рыболовные суда из КНДР.

Большую часть таких лодок находят пустыми или с телами на борту. Судя по всему, рыбаки заходят слишком далеко в море в поисках улова и либо теряются и гибнут – либо от голода, либо при сильном шторме.

В 2017 году деревянную лодку с восемью живыми пассажирами прибило к японскому берегу в районе города Юрихондзё.

Один из них объяснил, что на лодке действительно рыбаки из Северной Кореи, которые занимались ловлей кальмара. Из-за возникших в море проблем лодку отнесло в японские территориальные воды.

इतिहासकार इरफ़ान हबीब और केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के बीच आख़िर क्या हुआ था

केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान और भारत के विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब के बीच शनिवार को शुरू होने वाला विवाद ख़त्म होता नज़र नहीं आता. राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के 80वें संस्करण में हिस्सा लेने शनिवार को केरल के कोन्नूर विश्वविद्यालय पहुंचे थे.

राजयपाल के अनुसार उनके भाषण के दौरान इरफ़ान हबीब ने उन्हें “शारीरिक तौर पर रोकने की कोशिश की और मुझे हेकल (तंग) किया” उन्होंने एक न्यूज़ एजेंसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “मैंने जैसे ही अपने भाषण में गाँधी जी का नाम लिया इरफ़ान हबीब उठ गए और मेरी तरफ़ बढ़ने की कोशिश की.

मेरे एडीसी ने उन्हें रोका. बाईं तरफ़ कुलपति और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोका और दाईं तरफ़ मेरे एडीसी ने. फिर वो सोफ़े के पीछे से आये और मेरी तरफ़ बढ़े. वो वहीं खड़े रहे जिसके बाद लोगों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, नारे लगाने लगे”

इस घटना के बाद राज्यपाल के दफ़्तर ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए और लिखा, “इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस की उद्घाटन सभा में कोई विवाद नहीं हुआ. कोन्नूर विश्वविद्यालय में आयोजित इसके 80वें संस्करण में इरफ़ान हबीब ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर कुछ बिंदु उठाए. जब राज्यपाल ने इसका जवाब दिया तो इरफ़ान हबीब ने सीट से उठ कर उन्हें रोकने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि राज्यपाल को मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद का नाम लेने का कोई हक़ नहीं है, उन्हें गोडसे का नाम लेना चाहिए.”

लेकिन इस पूरे विवाद पर इरफ़ान हबीब का क्या कहना है? मैंने उनकी प्रतक्रिया जानने के लिए सोमवार की शाम उन्हें कोन्नूर विश्वविद्यालय फ़ोन किया जहाँ इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस का जलसा अब भी जारी था.

उन्होंने कहा, “उन्हें (राजयपाल को) मैं कैसे रोक सकता हूँ. वो सुरक्षाकर्मियों से घिरे थे और मैं 88 साल का हूँ तो मैं उन्हें फिजिकली भाषण देने से कैसे रोक सकता हूँ”.

इरफ़ान हबीब के अनुसार उन्होंने राज्यपाल को भाषण के बीच टोका ज़रूर, “जब उन्होंने अबुल कलाम आज़ाद को अब्दुल कलाम आज़ाद कहके उनके हवाले से कहा कि उन्होंने मुसलमानों के बारे में कहा था कि हिंदुस्तान के मुसलमान गंदे तालाब में पानी की तरह हैं”.

वो आगे कहते हैं, “यह एक बहुत ही उत्तेजित बयान था. मैंने कुलपति से कहा कि इनको कहिये कि वो अपना भाषण ख़त्म करें.”

इरफ़ान हबीब ने कहा, “कुलपति से कहने के बाद मैं राज्यपाल की तरफ़ पलटा और वो बातें करते जा रहे थे बदतमीज़ी की. जब उन्होंने मौलाना आज़ाद का हवाला दिया तो मैंने उनसे ये ज़रूर कहा कि आप को मौलाना आज़ाद और गाँधी का नाम लेने की ज़रुरत नहीं है आप गोडसे का हवाला दीजिये. ये मैंने ज़रूर कहा है.”

इरफ़ान हबीब को वामपंथी इतिहासकार की हैसियत से देखा जाता है जबकि आरिफ़ मोहम्मद ख़ान एक प्रगतिशील विचारधारा वाले नेता समझे जाते हैं. लेकिन दोनों की तारें एक जगह मिलती हैं और वो है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जिससे दोनों का संबंध रहा है.

हबीब कहते हैं कि राज्यपाल का भाषण नियमों के ख़िलाफ़ सेशन के बीच में घुसाया गया.

उनके मुताबिक़, नियमों के अनुसार उन्हें केवल 10 मिनट बोलना था, ना कि 31 मिनट.

इरफ़ान हबीबी कहते हैं, “हमारी परंपरा ये है कि अधिवेशन की शुरुआत कार्यवाहक अध्यक्ष से होती है जो मैं था. वो एक छोटा सा भाषण देता है जिसके बाद आने वाले अध्यक्ष से कहता है कि अब आप भाषण दें.”

इरफ़ान हबीब को हैरानी इस बात पर हुई कि राज्यपाल को उस समय भाषण का समय दे दिया गया जिस समय उनका भाषण नहीं था.

इरफ़ान हबीब को इस बात पर भी आपत्ति थी कि राज्यपाल की सुरक्षा टीम ने उस कांफ्रेंस हॉल को चार भागों में बाँट दिया जहाँ सभी लोग मौजूद थे.

“एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक कोई नहीं जा सकता था. मैंने और मंच में जगह लेने वालों ने जब स्टेज पर जाने से मना कर दिया तो केवल हमारे लिए एक बैरिकेड कुछ पल के लिए हटा दिया गया.”

इरफ़ान हबीब आगे कहते हैं, ”इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस का अधिवेशन 1935 से हो रहा है. मैं ख़ुद 1947 से इसमें भाग ले रहा हूँ. लेकिन आज तक, यहाँ तक कि अंग्रेज़ों के ज़माने में भी, सुरक्षाकर्मियों का हस्तक्षेप नहीं हुआ.”

उनके अनुसार हिस्ट्री की कांफ्रेंस में सुरक्षा कर्मियों का क्या काम. इसे हटवाने के लिए उन्होंने मांग भी की.

इरफ़ान हबीब का कहना था, “मैंने कहा जब तक बैरिकेड नहीं हटेगा हम राज्यपाल साहेब के साथ मंच पर बैठने नहीं जाएंगे. हमारे सभी पदाधिकारी हमारे साथ थे उन्होंने भी यही पोज़िशन ली. जब उन्हें मालूम हुआ कि हम मंच पर नहीं जाएंगे तब पुलिस ने बैरिकेड हटाया और हमें जाने दिया”

राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इरफ़ान हबीब और एक सांसद के भाषण के बाद अपना भाषण शुरू किया.

उन्होंने कहा कि उनकी समझ से ये सम्मलेन इतिहास पर है लेकिन “यहाँ तो सियासी भाषण दिए गए हैं”. राज्यपाल ख़ान का कहना था कि उनसे पहले के भाषणों में कश्मीर और नागरिकता संशोधन क़ानून का ज़िक्र हुआ था.

इस पर इरफ़ान हबीब ने कहा कि उनका केवल इतना कहना था कि इतिहासकार को रिसर्च की ज़रुरत होती है जिसके लिए इंटरनेट और ब्रॉडबैंड की सुविधाएं ज़रूरी हैं.

“मैंने अपने भाषण में कहा कि कश्मीर में चार महीने से इंटरनेट पर प्रतिबन्ध है तो इतिहासकार अपने काम कैसे करेंगे? अपना रिसर्च किस तरह से करेंगे?”

केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान और भारत के विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब के बीच शनिवार को शुरू होने वाला विवाद ख़त्म होता नज़र नहीं आता. राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के 80वें संस्करण में हिस्सा लेने शनिवार को केरल के कोन्नूर विश्वविद्यालय पहुंचे थे.

राजयपाल के अनुसार उनके भाषण के दौरान इरफ़ान हबीब ने उन्हें “शारीरिक तौर पर रोकने की कोशिश की और मुझे हेकल (तंग) किया” उन्होंने एक न्यूज़ एजेंसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “मैंने जैसे ही अपने भाषण में गाँधी जी का नाम लिया इरफ़ान हबीब उठ गए और मेरी तरफ़ बढ़ने की कोशिश की.

मेरे एडीसी ने उन्हें रोका. बाईं तरफ़ कुलपति और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोका और दाईं तरफ़ मेरे एडीसी ने. फिर वो सोफ़े के पीछे से आये और मेरी तरफ़ बढ़े. वो वहीं खड़े रहे जिसके बाद लोगों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, नारे लगाने लगे”

इस घटना के बाद राज्यपाल के दफ़्तर ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए और लिखा, “इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस की उद्घाटन सभा में कोई विवाद नहीं हुआ. कोन्नूर विश्वविद्यालय में आयोजित इसके 80वें संस्करण में इरफ़ान हबीब ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर कुछ बिंदु उठाए. जब राज्यपाल ने इसका जवाब दिया तो इरफ़ान हबीब ने सीट से उठ कर उन्हें रोकने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि राज्यपाल को मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद का नाम लेने का कोई हक़ नहीं है, उन्हें गोडसे का नाम लेना चाहिए.”

लेकिन इस पूरे विवाद पर इरफ़ान हबीब का क्या कहना है? मैंने उनकी प्रतक्रिया जानने के लिए सोमवार की शाम उन्हें कोन्नूर विश्वविद्यालय फ़ोन किया जहाँ इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस का जलसा अब भी जारी था.

उन्होंने कहा, “उन्हें (राजयपाल को) मैं कैसे रोक सकता हूँ. वो सुरक्षाकर्मियों से घिरे थे और मैं 88 साल का हूँ तो मैं उन्हें फिजिकली भाषण देने से कैसे रोक सकता हूँ”.

इरफ़ान हबीब के अनुसार उन्होंने राज्यपाल को भाषण के बीच टोका ज़रूर, “जब उन्होंने अबुल कलाम आज़ाद को अब्दुल कलाम आज़ाद कहके उनके हवाले से कहा कि उन्होंने मुसलमानों के बारे में कहा था कि हिंदुस्तान के मुसलमान गंदे तालाब में पानी की तरह हैं”.

वो आगे कहते हैं, “यह एक बहुत ही उत्तेजित बयान था. मैंने कुलपति से कहा कि इनको कहिये कि वो अपना भाषण ख़त्म करें.”

इरफ़ान हबीब ने कहा, “कुलपति से कहने के बाद मैं राज्यपाल की तरफ़ पलटा और वो बातें करते जा रहे थे बदतमीज़ी की. जब उन्होंने मौलाना आज़ाद का हवाला दिया तो मैंने उनसे ये ज़रूर कहा कि आप को मौलाना आज़ाद और गाँधी का नाम लेने की ज़रुरत नहीं है आप गोडसे का हवाला दीजिये. ये मैंने ज़रूर कहा है.”

इरफ़ान हबीब को वामपंथी इतिहासकार की हैसियत से देखा जाता है जबकि आरिफ़ मोहम्मद ख़ान एक प्रगतिशील विचारधारा वाले नेता समझे जाते हैं. लेकिन दोनों की तारें एक जगह मिलती हैं और वो है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जिससे दोनों का संबंध रहा है.

हबीब कहते हैं कि राज्यपाल का भाषण नियमों के ख़िलाफ़ सेशन के बीच में घुसाया गया.

उनके मुताबिक़, नियमों के अनुसार उन्हें केवल 10 मिनट बोलना था, ना कि 31 मिनट.

इरफ़ान हबीबी कहते हैं, “हमारी परंपरा ये है कि अधिवेशन की शुरुआत कार्यवाहक अध्यक्ष से होती है जो मैं था. वो एक छोटा सा भाषण देता है जिसके बाद आने वाले अध्यक्ष से कहता है कि अब आप भाषण दें.”

इरफ़ान हबीब को हैरानी इस बात पर हुई कि राज्यपाल को उस समय भाषण का समय दे दिया गया जिस समय उनका भाषण नहीं था.

इरफ़ान हबीब को इस बात पर भी आपत्ति थी कि राज्यपाल की सुरक्षा टीम ने उस कांफ्रेंस हॉल को चार भागों में बाँट दिया जहाँ सभी लोग मौजूद थे.

“एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक कोई नहीं जा सकता था. मैंने और मंच में जगह लेने वालों ने जब स्टेज पर जाने से मना कर दिया तो केवल हमारे लिए एक बैरिकेड कुछ पल के लिए हटा दिया गया.”

इरफ़ान हबीब आगे कहते हैं, ”इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस का अधिवेशन 1935 से हो रहा है. मैं ख़ुद 1947 से इसमें भाग ले रहा हूँ. लेकिन आज तक, यहाँ तक कि अंग्रेज़ों के ज़माने में भी, सुरक्षाकर्मियों का हस्तक्षेप नहीं हुआ.”

उनके अनुसार हिस्ट्री की कांफ्रेंस में सुरक्षा कर्मियों का क्या काम. इसे हटवाने के लिए उन्होंने मांग भी की.

इरफ़ान हबीब का कहना था, “मैंने कहा जब तक बैरिकेड नहीं हटेगा हम राज्यपाल साहेब के साथ मंच पर बैठने नहीं जाएंगे. हमारे सभी पदाधिकारी हमारे साथ थे उन्होंने भी यही पोज़िशन ली. जब उन्हें मालूम हुआ कि हम मंच पर नहीं जाएंगे तब पुलिस ने बैरिकेड हटाया और हमें जाने दिया”

राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इरफ़ान हबीब और एक सांसद के भाषण के बाद अपना भाषण शुरू किया.

उन्होंने कहा कि उनकी समझ से ये सम्मलेन इतिहास पर है लेकिन “यहाँ तो सियासी भाषण दिए गए हैं”. राज्यपाल ख़ान का कहना था कि उनसे पहले के भाषणों में कश्मीर और नागरिकता संशोधन क़ानून का ज़िक्र हुआ था.

इस पर इरफ़ान हबीब ने कहा कि उनका केवल इतना कहना था कि इतिहासकार को रिसर्च की ज़रुरत होती है जिसके लिए इंटरनेट और ब्रॉडबैंड की सुविधाएं ज़रूरी हैं.

“मैंने अपने भाषण में कहा कि कश्मीर में चार महीने से इंटरनेट पर प्रतिबन्ध है तो इतिहासकार अपने काम कैसे करेंगे? अपना रिसर्च किस तरह से करेंगे?”

欧盟对华为犹豫不决 中国警告欧盟要承受后果

中国警告欧盟不要限制中国公司进入欧洲,并说那样欧盟会破坏自身利益,并且阻碍中国在欧洲的投资。

中国驻欧盟大使张明说,外国公司所有权,贸易机会和5G与移动通讯计划可能会令产生“不信任”的中国企业家作出反应。

他在接受采访时说,欧盟国家需要促进国际合作和市场自由,“否则他们会面临灾难性后果”。他说希望欧盟能够维护多边主义,自由贸易,以及公开,公平,正义和不歧视的原则。

批评者认为欧盟在对北京的战略雄心,民族主义贸易政策,以及对西方公司的做法方面做出反应,他们抱怨欧盟的反应不够及时。欧洲公司和欧盟国家的政府长期以来都抱怨中国限制他们进入中国市场,对国内企业实行大量优惠政策。

《金融时报》报道说,张明的讲话说明目前欧盟与中国在此问题上的紧张局面。他说欧盟采取强硬态度令“在欧洲工作的许多中国企业家产生怀疑”,而且“对中国在欧盟的投资会产生某种冲击”。

据彭博社报道,在本月早些时候中国驻德大使吴恳指出,“所谓安全问题只是美国打压和制裁华为的幌子,如果德国以安全为由将华为排除在5G网络建设之外,中国不会放任不管。”

吴恳说,去年德国汽车占中国汽车销售市场的四分之一,“我们是否有一天也会说德国汽车不安全,因为我们有能力生产自己的汽车?不,这纯粹是贸易保护主义。”

据料欧盟国家将在1月份公布关于加强对5G网络设备公司的安全检查的最后的建议。

目前华为公司在5G领域居世界领先地位,而且在欧洲十分活跃。欧盟正在制定更严格的采购规则和对外资的筛选甄别制度,包括那些利用政府支持取得对欧洲竞争对手优势的公司。

新疆和孔子学院
张明在采访中还提及欧盟同中国的其他争议热点。欧盟的一些游说组织谴责北京在新疆的所谓再教育营拘押了100多万维吾尔族穆斯林。他说欧盟指责中国的人权纪录的言辞和行动“不公正,不诚实”。

他还批评了欧盟国家针对中国国家资助的孔子学院采取的措施。北京坚持说孔子学院是文化机构,不是批评者所说的宣传或间谍工具。

张明说,“一段时间以来美国和一些西方政客和媒体怀疑孔子学院。他们谴责孔子学院,但并没有拿出任何真凭实据,那是十分过激和具有歧视性的做法。”

中国警告欧盟不要限制中国公司进入欧洲,并说那样欧盟会破坏自身利益,并且阻碍中国在欧洲的投资。

中国驻欧盟大使张明说,外国公司所有权,贸易机会和5G与移动通讯计划可能会令产生“不信任”的中国企业家作出反应。

他在接受采访时说,欧盟国家需要促进国际合作和市场自由,“否则他们会面临灾难性后果”。他说希望欧盟能够维护多边主义,自由贸易,以及公开,公平,正义和不歧视的原则。

批评者认为欧盟在对北京的战略雄心,民族主义贸易政策,以及对西方公司的做法方面做出反应,他们抱怨欧盟的反应不够及时。欧洲公司和欧盟国家的政府长期以来都抱怨中国限制他们进入中国市场,对国内企业实行大量优惠政策。

《金融时报》报道说,张明的讲话说明目前欧盟与中国在此问题上的紧张局面。他说欧盟采取强硬态度令“在欧洲工作的许多中国企业家产生怀疑”,而且“对中国在欧盟的投资会产生某种冲击”。

据彭博社报道,在本月早些时候中国驻德大使吴恳指出,“所谓安全问题只是美国打压和制裁华为的幌子,如果德国以安全为由将华为排除在5G网络建设之外,中国不会放任不管。

吴恳说,去年德国汽车占中国汽车销售市场的四分之一,“我们是否有一天也会说德国汽车不安全,因为我们有能力生产自己的汽车?不,这纯粹是贸易保护主义。”

据料欧盟国家将在1月份公布关于加强对5G网络设备公司的安全检查的最后的建议。

目前华为公司在5G领域居世界领先地位,而且在欧洲十分活跃。欧盟正在制定更严格的采购规则和对外资的筛选甄别制度,包括那些利用政府支持取得对欧洲竞争对手优势的公司。

新疆和孔子学院
张明在采访中还提及欧盟同中国的其他争议热点。欧盟的一些游说组织谴责北京在新疆的所谓再教育营拘押了100多万维吾尔族穆斯林。他说欧盟指责中国的人权纪录的言辞和行动“不公正,不诚实”。

他还批评了欧盟国家针对中国国家资助的孔子学院采取的措施。北京坚持说孔子学院是文化机构,不是批评者所说的宣传或间谍工具。

张明说,“一段时间以来美国和一些西方政客和媒体怀疑孔子学院。他们谴责孔子学院,但并没有拿出任何真凭实据,那是十分过激和具有歧视性的做法。

नागरिकता संशोधन: असम में ‘गुस्सा’ क्यों फूटा?

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित खूबसूरत और अपने चाय के बागानों के लिए प्रसिद्ध असम में लोगों में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर बेहद गुस्सा भरा है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

यह वो क़ानून है जिससे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के गैर-मुस्लिम आबादी के लिए भारत की नागरिकता लेना आसान हो जाएगा.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

राज्य के कुछ ज़िलों में बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए हज़ारों की तादाद में सैनिकों को तैनात किया गया है. कर्फ़्यू लगाया गया है, इंटरनेट की सेवाएं निलंबित की गई हैं. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुई हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

लेकिन इस नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर सबसे पहले उबलने वाले असम में जो विरोध प्रदर्शन चल रहा है वो भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर ख़तरे के प्रति किसी चिंता की वजह से नहीं है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

उनके लिए ‘बाहरी लोग’ के यहां आने से आबादी और सांस्कृतिक के स्वरूप के बिगड़ने का ख़तरा है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

तनाव का एक कारण यह है कि असम भारत का एक बहुत ही जटिल और बहु-जातीय राज्यों में से एक है. यहां असमिया और बांग्ला बोलने वाले हिंदुओं के साथ आदिवासियों का एक मिश्रित समूह रहता है. यहां की कुल 3.2 करोड़ आबादी का एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों का है. आबादी के लिहाज से यह संख्या भारत प्रशासित कश्मीर के बाद सर्वाधिक है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

यह भारत के सबसे अधिक खंडित और अशांत राज्यों में से एक रहा हैः पूर्वोत्तर के चार राज्य असम से निकाल कर बनाए गए हैं और वर्तमान में असम में रह रहे आदिवासियों के तीन समूह अपना अलग राज्य चाहते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

यहां के लोगों ने भाषाई पहचान और नागरिकता के मुद्दे पर संघर्ष किया है. असमिया और बांग्ला भाषी लोगों के बीच नौकरियों और संसाधनों को लेकर प्रतिद्वंद्विता रही है जो यहां सदियों से रह रही स्वदेशी जनजातियों के वैध दावों और आकांक्षाओं की अनदेखी किया करते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

इसके अलावा बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासियों का मुद्दा भी है जो सदियों से एक गंभीर चिंता का विषय रहा है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

बांग्लादेश के साथ असम लगभग 900 किलोमीटर की सीमा साझा करता है. इस सीमा को लांघ कर हिंदू और मुसलमान दोनों ही आए हैं. कुछ धार्मिक उत्पीड़न की वजह से तो अन्य नौकरियों की तलाश में. राज्य में अवैध विदेशियों की तादाद का अनुमान 40 लाख से एक करोड़ के बीच तक है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

1980 में छह सालों तक यहां इन विदेशियों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन चला. इस दौरान सैकड़ों लोगों की हत्याएं हुईं. इसके बाद 1985 में प्रदर्शनकारियों और केंद्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ. यह सहमति बनी कि जो भी 24 मार्च 1971 के बाद उचित दस्तावेज़ के बिना असम में घुसा है उसे विदेशी घोषित करते हुए निर्वासित किया (वापस भेजा) जाएगा.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

हालांकि, जब अगले तीन दशकों तक कुछ भी नहीं बदला, तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि 1951 में बना ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़ंस’ (एनआरसी) यहां के वास्तविक नागरिकों की पहचान कर अपडेट किया जाए.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

अगस्त 2019 में अपडेटेड नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़ंस (एनआरसी), जैसा कि इसे कहा जाता है, प्रकाशित किया गया लेकिन इससे क़रीब 20 लोगों को बाहर रखा गया, यानी प्रभावी रूप से उनसे नागरिकता छीन ली गई.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

जब यह अपडेटेड रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़ंस (एनआरसी) तैयार किया जा रहा था तो केंद्र की सत्ता में आसीन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसका समर्थन किया था.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

इसके बाद उसे असम में हिंदुओं और आदिवासियों का बहुत बड़ा समर्थन मिला और वह 2016 में राज्य की सत्ता पर आसीन हो गई.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

लेकिन अंतिम रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़ंस (एनआरसी) जब प्रकाशित किया गया तो बीजेपी ने यह कहते हुए अपनी नीति बदल दी कि इसमें कुछ त्रुटियां रह गई हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

इसकी वजह यह थी कि बहुत से बंगाली हिंदू, जो पार्टी के लिए मजबूत वोट बैंक थे, उन्हें इस सूची में जगह नहीं मिली थी और उन पर अवैध अप्रवासी बनने का ख़तरा मंडरा रहा था.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

अब बीजेपी ने यह घोषणा की है कि एनआरसी की जो पहली लिस्ट प्रकाशित की गई है उसकी ग़लतियों को सुधारने के लिए एक और अपडेटेड लिस्ट बनाई जाएगी.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

एनआरसी और नागरिकता क़ानून दोनों से ही अब पुराने फॉल्ट लाइन खुलने की आशंका है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

यहां असमिया भाषा बोलने वाली लगभग आधी आबादी को लगता है कि अवैध प्रवासियों का पता लगाने और उन्हें वापस भेजने का वादा करने वाली बीजेपी ने उन्हें धोखा दिया है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

मुसलमानों में गुस्सा है कि नागरिकता क़ानून भेदभावपूर्ण है और अंत में केवल उनके धर्म के लोगों को अवैध प्रवासियों के तौर पर चुना जाएगा.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

बंगाली भाषी हिंदू भी परेशान है क्योंकि मुसलमानों की जगह उनके (बंगाली भाषी) लोग एनआरसी से बाहर हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

चिंताएं और भी हैं. इस क़ानून के तहत असम के कुछ क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा प्रदान है. ये इलाके आदिवासी बहुत हैं और यहां किसी भी समुदाय के अवैध अप्रावासियों के बसने पर रोक है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

लेकिन कईयों का कहना है कि चूंकि यह पूरे इलाके को कवर नहीं करता है, लिहाजा यहां के लोग असम के अन्य हिस्सों में भी जा सकते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

2016 में अघोषित संपत्ति को बाहर निकालने के लिए की गई नोटबंदी का हवाला देते हुए पूर्वोत्तर के मामलों के जानकार सुबीर भौमिक कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि बीजेपी को असम में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी को लेकर ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद रही होगी. यहां हो रहा विरोध प्रदर्शन उनके लिए बहुत बड़ी मुसीबत ला सकता है.”मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

वे कहते हैं, “ऐसा लगता है कि बीजेपी को इस तूफ़ान की आशंका नहीं थी.”मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

भौमिक कहते हैं कि इससे हुए नुकसान को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ट्वीट किया कि ‘उनकी सरकार असमिया लोगों के राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और ज़मीन के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध है. कोई भी आपके अधिकारों, विशिष्ट पहचान और खूबसूरत संस्कृति को आपसे छीन नहीं सकता.’मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

लेकिन प्रधानमंत्री का यह ट्वीट असम के प्रदर्शनकारियों को शांत करने में कितना कारगर होगा, यह तो समय ही बताएगा.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह

هل يمكن لاجتماعات العمل أن تكون لك “علاجا”؟

يقول باحثون إن الاجتماعات في أماكن العمل ينبغي النظر إليها كشكل من أشكال “علاج المديرين” فضلا عن كونها لاتخاذ قرارات.

ويؤكد أكاديميون من جامعة مالمو في السويد أن الاجتماعات تتيح مُتنفَسا للعاملين يتحدثون من خلاله عن أحوالهم أو يعبّرون عما يشعرون به من إحباط.

ويشير الباحث في العلوم السياسية، باتريك هول، إلى أن عدد هذه الاجتماعات في أماكن العمل آخذٌ في الزيادة، والسبب في ذلك أن ارتفاع عدد الوظائف الإدارية والاستراتيجية يستتبع بدوره زيادة في عدد الاجتماعات.

وعلى الرغم من تلك الزيادة في عدد الاجتماعات إلا أن “عددا ضئيلا من القرارات يُتَّخذ”.

وأعدّ هول بحثا عن التناقض الواضح بين اعتقاد البعض في قلة أهمية اجتماعات العمل، وزيادة أعداد تلك الاجتماعات في الوقت ذاته.

يقول الباحث إن زيادة عدد الاجتماعات يعكس تغيرات في قوة العمل؛ حيث عددٌ قليل يعمل وينتج بينما يتزايد عدد أولئك المنخرطين في تلك الاجتماعات من استراتيجيين واستشاريين ومديرين و”أشخاص لا يقومون بأي عمل ملموس”.

ويشير هول إلى ارتفاع في الوظائف الإدارية غير محددة المهام في الغالب، وحيث معالم الترتيب الهرمي للوظائف غير واضحة.

“العديد من المديرين لا عِلْم لهم بمهامهم على وجه التحديد، وفي مواجهة هذه الضبابية، يستعين هؤلاء المديرون بزيادة عدد الاجتماعات، لعلهم يتعرفون على أدوارهم عبر الحديث”.

ويؤكد الباحث أن الكثيرين من هؤلاء يمكن أن يقضوا نصف ساعات عملهم في الاجتماعات.

ويمكن أن يمتد زمن الاجتماعات ليغطي فترات ما قبل وما بعد زمن انعقادها، على نحو قد يتنّكر له الذين يحضرونها بالنظر إلى الوقت الذي تستغرقه.

فرصة لعرض الشكوى
يمكن للاجتماعات أن تثير شعورا باللاجدوى والعبثية، وبهذا يضيع الهدف منها، بحسب الباحث هول، الذي يرى في الاجتماعات، لا سيما الطويلة منها، فرصة لأداء وظيفة “تكاد تكون علاجية”.

وبغض النظر عما يُفترَض أن يُطرَح في الاجتماعات للنقاش، فإنها تعتبر فرصة لطرح الشكوى أمام الزملاء.

لكن الذين يترددون على الكثير من الاجتماعات يمكن أن يفقدوا صبرهم – ويمكن أن يقضوا الكثير من الوقت منشغلين بهواتفهم المحمولة، بحسب ما يقول الباحثون.

ويقول هول إن “البعض يشعر بالإحباط في هذه الاجتماعات ويتساءل عن علة وجوب حضورها واحتمالها”.

لكنه يستدرك قائلا إن الشعور السلبي تجاه الاجتماعات يمكن أن يكون ناجما عن عدم الوقوف على أهدافها الحقيقية.

ويؤكد الباحث أن العديد من الاجتماعات الداخلية المنتظمة قد يبدو للمشاركين فيها أنها “بلا جدوى” على الإطلاق.

لكن هول يرى أن الهدف الحقيقي من مثل تلك الاجتماعات قد يتمثل في التأكيد على سُلطة ومرجعية المؤسسة بحيث يتذكر الموظفون دائما أنهم جزء منها.

ومثل هذه الاجتماعات لا تستهدف في واقع الأمر اتخاذ قرارات، بحسب هول.

مسجد بابري أم معبد الإله راما؟ محكمة هندية تحسم النزاع بين المسلمين والهندوس

قضت المحكمة العليا في الهند بحسم ملكية موقع مقدس في شمال البلاد يتنازع عليه المسلمون والهندوس منذ عقود، لمصلحة الهندوس الذين يريدون بناء معبد فيه.

وتدور القضية حول ملكية الأرض في مدينة أيوديا بولاية أوتار براديش الهندية التي يقول المسلمون إنها كانت موقع مسجد بابري الذي هدمه متطرفون هندوس، ويحاجج الهندوس بأنها موقع مقدس لديهم قبل الإسلام.

وقد تسبب النزاع المستمر بشأن الموقع في سقوط مئات من الضحايا في الصدامات والشجارات التي نجمت عنه.

ويُعتقد الكثير من الهندوس أن الموقع هو مسقط رأس أحد أكثر الآلهة تبجيلاً لديهم، “الإله راما”، بينما يقول المسلمون إنهم ظلوا على مر الأجيال يؤدون طقوس العبادة وصلواتهم في المسجد الذي كان مبنيا في الموقع منذ مئات السنين.

وكان مسجد بابري الذي يعود تاريخه إلى القرن السادس عشر هدم على أيدي حشود من المتشددين الهندوس في عام 1992، ما أثار أعمال شغب أسفرت عن مقتل ما يقرب من ألفي شخص.

يعتقد الكثير من الهندوس أن مسجد بابري شُيّد على أنقاض معبد هندوسي في هضبة راماكو المقدسة لديهم، هدمه “الغزاة المسلمون” في القرن السادس عشر.

ويقول المسلمون إن الموقع هو مسجد بني في زمن الإمبراطور المغولي المسلم الذي حكم الهند، ظهير الدين محمد بابر، الذي أمر ببنائه في القرن الـ 16.

إلا أن الهندوس يزعمون أن ظهير الدين بابر هدم معبدهم في القرن الـ 16 وبنى مسجده فوقه.

ويرى المسلمون أن هذا صراع حديث على المسجد الذي ظلوا يصلون فيه لقرون، نشأ في عام 1949 عندما تسلل بعض الهندوس وقاموا بوضع تمثال “الإله راما” في المسجد وبدأوا في أداء طقوس عبادتهم له.

وكانت مجموعة من الهندوس هاجمت المسجد في ديسمبر/كانون الأول 1949، وازدادت حدة التوتر بينهم وبين المسلمين في أعقاب ذلك، ما أدى إلى قيام الشرطة بوضع الموقع تحت الحراسة وإغلاقه لحين حل النزاع بين الطرفين.

وقد عرض الخلاف بين المجموعتين الدينيتن على المحاكم مرات عديدة للنظر في الإدعاءات المتناقضة عن أصل الموقع.

وفي ديسمبر/كانون الأول عام 1992 احتل الآلاف من الهندوس المتشددين الموقع وقاموا بهدم مبنى المسجد.

ومنذ ذلك الحين، تصاعدت الدعوات لبناء معبد على الفور في موقع المسجد السابق.

وتعد الهندوسية ديانة الأغلبية في الهند ويعتقد أن عمرها أكثر من 4000 عام، أما الأسلام فيمثل ثاني أكبر ديانة فيها وتعود بداية ظهورها هناك إلى القرن السابع الميلادي، وانتشرت بشكل كبير بعد دخول جيوش المسلمين إلى شمال الهند في القرن الثالث عشر الميلادي.

قضت المحكمة بالإجماع، بأن “هيئة المسح الأثري الهندية” أصدرت تقريراً قدمت فيه دليلاً على أن هناك بقايا مبنى “غير إسلامي” تحت هيكل مسجد بابري المهدوم.

وقالت المحكمة إنه بالنظر إلى جميع الأدلة المقدمة، فقد قررت أن الأرض المتنازع عليها بين المسلمين والهندوس يجب أن تُمنح للهندوس من أجل معبد الإله راما، على أن يتم منح المسلمين قطعة أرض أخرى في مكان آخر لبناء مسجد عليها.

وحضت المحكمة الحكومة الفيدرالية الهندية على إنشاء هيئة خاصة للإشراف على بناء المعبد.

कितनी तबाही मचा सकता है ‘महा’ तूफ़ान?

‘वायु’, ‘हिक्का’ और अब ‘महा’ तूफ़ान. इस साल अरब सागर से चार तूफ़ान गुजरात के समुद्री तट पर चिंताएं लेकर आए.

मौसम विभाग के मुताबिक महा तूफ़ान बुधवार को दीव और पोरबंदर पहुंच सकता है.

लेकिन अरब सागर से एक साल में चार तूफ़ान कैसे आए और महा तूफ़ान गुजरात पर क्या असर डालेगा?

दरअसल पिछले कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन की वजह से अरब सागर में पानी का तापमान तेज़ी से बढ़ा है, तूफ़ान आने का ये एक कारण है. इसकी वजह से बारिश भी ज़्यादा हुई.

इस साल बंगाल की खाड़ी से दो तूफ़ान और अरब सागर से चार तूफ़ान आए.

डाउन टू अर्थ में नेहा यादव की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अरब सागर में पानी की सतह ठंडी है. इसलिए वहां बंगाल की खाड़ी के मुक़ाबले कम तूफ़ान आते हैं और कई तूफ़ान समुद्र के पास आकर खत्म हो जाते हैं.

लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से अरब सागर के पानी का तापमान बढ़ रहा है और ये चिंता का विषय है.

1998 और 2018 के बीच, ऐसे पांच तूफ़ान आए जिनकी तीव्रता अरब सागर में बहुत ज़्यादा थी.

अहमदाबाद के मौसम विभाग के निदेशक जयंत सरकार के मुताबिक, अरब सागर में तूफ़ानों की एक वजह उसके सतह के पानी के तापमान का बढ़ना भी हो सकता है.

महा तूफ़ान का केंद्र लक्षद्वीप में था. जिसकी वजह से केरल, तमिलनाडु और लक्षद्वीप में भारी बारिश हुई.

बुधवार को इसके 70 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से दीव और पोरबंदर पहुंचने की आशंका है.

इससे सौराष्ट्र, दक्षिण गुजरात और कोंकण के साथ-साथ महाराष्ट्र के पुणे में भारी बारिश हो सकती है.

मौसम विभाग का ये भी अनुमान है कि गुजरात पहुंचते-पहुंचते महा तूफ़ान कमज़ोर पड़ सकता है.

हो सकता है कि गुजरात में जान-माल का नुकसान न हो, लेकिन इस इलाके में तेज़ हवाओं के साथ भारी बारिश हो सकती है.

फिलहाल गुजरात में कपास, मूंगफली, जीरा और धान की फसल लगी हुई है. लेकिन मॉनसून के खिंचने और दो तूफ़ानों की वजह से बेमौसम बरसात के चलते किसानों को नुकसान हुआ है.

प्रशासन के मुताबिक राज्य में महा से निपटने की पूरी तैयारियां कर ली गई हैं और इसकी स्थिति पर क़रीबी नज़र रखी जा रही है.

राज्य के प्रमुख सचिव जेएन सिंह ने कहा, “हमने समुद्री तटों पर पर्यटन की गतिविधियों को रोकने की सलाह दी है और साथ ही मछुआरों को समुद्र में ना जाने के लिए कहा गया है.”

उन्होंने बताया कि स्टेट डिज़ास्टर रिस्पांस फोर्स और नेशनल डिज़ास्टर रिस्पांस फोर्स इसके लिए पूरी तरह से तैयार है.

महा तूफ़ान को लेकर गुजरात के आपदा विभाग ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

इसमें कहा गया है कि अगर आपके घर या आसपास की इमारत को मरम्मत की ज़रूरत है तो उसे पूरा कर लें, ताकि किसी बड़े हादसे से बचा जा सके.

अपने परिवार के सदस्यों, बच्चों और पड़ोसियों के साथ-साथ अपने आस-पास के लोगों को तूफ़ान के बारे में बता दें. साथ ही उन्हें ये भी बताएं कि इससे कैसे बचा जा सकता है.

ज़रूरी कागज़ातों को सुरक्षित जगहों पर रख दें, ताकि बारिश या बाढ़ की स्थिति में वो ख़राब न हों.

आपके पास परिवार के सदस्यों की तस्वीरें और ब्लड ग्रुप की जानकारी होनी चाहिए.

घर में एक हफ़्ते का राशन, पानी और दवाइयां जमा कर लें.

आपके पास टॉर्च, एक्स्ट्रा बैटरी और मिट्टी के तेल के लैंप तैयार होने चाहिए.

आपतकाल की स्थिति के लिए आपके पास कंबल और कपड़े होने चाहिए.

तूफ़ान पर मौसम विभाग की हर एडवाइज़री का पता करते रहें और डिजास्टर मैनेजमेंट टीम की ओर से बताए गए सभी निर्देशों का पालन करें.

陈同佳案:杀害女友嫌犯愿赴台湾自首 再引台港司法角力

香港与台湾当局分别证实,涉嫌在台北杀害女友潘晓颖并弃尸的青年陈同佳,已经同意在香港服刑完毕后到台湾自首。但台湾官方表示,希望香港政府续押陈同佳。

陈同佳今年4月因洗钱罪名被香港法院判处监禁,预计将于近日刑满出狱。圣公会香港教省秘书长管浩鸣法政牧师星期五(10月18日)表示,陈同佳已经致函香港行政长官林郑月娥告知其决定。

香港特区政府对外表示,港府于台湾没有司法管辖权,无法就陈同佳在台犯行进行司法审查。此前林郑月娥政府为此提出修订《逃犯条例》,结果引爆自6月持续至今之“反送中”示威。台湾大陆委员会星期六(19日)批评港府“刻意放弃司法管辖权、别具用心”。

综合分析,因为两岸三地高度的政治敏感紧张关系,以及在香港示威仍未止息的当下,即使陈同佳抵台自首,短期间台港在司法合作上阻碍仍在。

林郑月娥星期六出席香港商业电台议政节目时表示已收到陈同佳方面来函。她认为,陈同佳计划自首“是一个令人释怀和宽心的结局”,她又称陈同佳的决定为香港社会“带来宽松的感觉。”

林郑月娥称,香港警务处星期五已致函台湾警政署刑事警察局,并称香港特区政府将提供给台湾合法及合理的协助。

陈同佳预计下星期三(23日)刑满出狱,港府星期五晚间发表新闻稿称,香港律政司没有足以控告陈同佳在台湾涉杀人之证据,对于陈同佳在台湾涉嫌犯的罪,香港法庭并无管辖权,不可能将陈同佳续押,或向他追诉涉嫌在台湾所犯的罪行。

至于圣公会管浩鸣牧师为何会牵涉其中,管浩鸣牧师向香港媒体介绍,他一向有到监狱探望囚犯,半年前主动认识陈同佳。管牧师称,陈同佳对于自己引发了《逃犯条例》争议感到“很不开心”,希望回去台湾自首后,香港的争端能得以平息。

台湾中央社报道,负责侦办此案的台湾士林地方检察署发言人邱智宏表示,因为台湾已发通缉令,陈同佳只要入境台湾,当局便可立即逮捕他,再作后续刑事程序。邱志宏说明,“港人的处理程序与其他外国疑犯并无分别”。

金门大桥“天使”如何挽救数以百计的自杀者

他突然爬过安全栏,从75米高的桥上往太平洋纵身一跃。这是2006年纪录片《桥》开场五分钟里的场景。该片揭示了金门大桥的阴暗面:作为美国被拍摄得最多的人工建筑和世界上访客量最大的桥梁,它也是全球最热门的自杀点之一。

据金门大桥公路和运输区(Golden Gate Bridge Highway and Transportation District)的数据,自1937年5月大桥落成以来,已有1700多人自杀身亡。仅2018年,就有187人试图自杀:每隔一天就有一个人跳桥。执法人员和志愿者共同救下27人。

过去20年,米娅·穆纳耶(Mia Munayer)和凯文·布里格斯(Kevin Briggs)拯救了大约100条生命。 他们都是警察。尽管布里格斯已经从著名的加利福尼亚公路巡逻队(其成员普遍称为CHiP)退休。

穆纳耶的志愿者机构“天使”定期在桥上部署巡逻,以协助当局发现可能的自杀企图。布里格斯被称为“金门守卫者”,他和有意跳桥自杀的人进行了200多次成功的谈判。

然后她组建了志愿团队“天使”,自2011年起,在像情人节或平安夜这样的关键节点在金门大桥巡逻。接受培训后,他们让那些可能会遇到麻烦的人参与到志愿工作。

美国疾病控制与预防中心(CDC)分析的最新的数据源于2017年,那一年有4.7万人在美国自杀。

现在在10至34岁的美国人中,自杀是第二大死因。

穆纳耶自己花了一万多美元来资助这些活动。其中包括为有兴趣参与巡逻的人举办讲座。美国退伍军人事务部说,近年来,庆祝退伍军人的节日已成为一个很具体和现实的问题:年轻退伍军人的自杀率飙升,每10万人中40多人自杀身亡。

这是美国全国每10万人中14人自杀身亡比例的三倍。

女警察培训志愿者怎样发现那些看起来孤立无援和痛苦的人。他们学习鉴别的信号和有效的应对方法。

前CHiP警官布里格斯参与其中时别无选择。因为近20年来,金门大桥一直是他日常巡逻路线的一部分。

1994年,他第一次与一个试图跳桥的人相遇。

布里格斯告诉BBC:“当时警察没有接受过应对这些情况的正式培训。当我看到这位年轻女士爬过铁轨时,我感到非常震惊。”

“我自己开始阅读有关自杀干预的信息,这是个好办法,因为近20年来,我不得不应对这些情况。”

他解释说:”有时我会问我救过的人。我有哪些讲得对,哪些不对,哪些行为不好?“

布里格斯说服200多人放弃自杀,仅有两次失败案例

这位前警察说:“这些失败案例的记忆要比成功案例的帮助大”他后来与创伤后应激障碍作斗争。

如今他在全美巡回讲自杀干预,也是备受追捧的自杀防御的顾问。

2005年,布里格斯在一次营救中成名,当地媒体对此进行了广泛报道。当时他发现22岁的凯文·伯西亚(Kevin Berthia)患有抑郁症,伯西亚为治疗早产的小女儿花了25万美元医疗费,当时他想在桥上上吊自杀。

法国前总统希拉克逝世:政治生涯以及与美国、中国关系回顾

法国前总统雅克·希拉克逝世,享年86岁。希拉克1995年至2007年两度出任法国总统。

他在国内推出的重大政治改革之一是将总统任期从七年减至五年。在国际舞台,2003年,希拉克曾经强烈反对美国入侵伊拉克。法国的否决票对巴黎和美国、英国的关系带来长期影响。

从政期间,希拉克也曾卷入腐败指控。

近年来,希拉克由于健康原因数次住院,很少公开露面。

几十年来,希拉克在法国政坛一直颇有影响。

年轻时,希拉克一手拿着香烟、一手端着啤酒,潇潇洒洒地赢得了乡间选区人民的支持,进入议会。

1967年希拉克首次升任部级,之后的从政生涯当中,几乎担任过所有的内阁职位。

1977年至1995年,希拉克担任巴黎市长将近20年。期间被卷入政党筹资及个人开支等丑闻。

但是丑闻仍然没有能够阻挡希拉克1995年赢得大选,成为继密特朗之后的法国总统。

2002年,希拉克再一次出人意料地在大选中获胜。原因之一是极右的国民阵线主席勒庞进入第二轮。

那次大选令法国选民陷入两难,他们觉得自己被迫在骗子和法西斯之间做出选择。有些人鼻子上戴着夹子前往投票站,意思是大选散发的臭气让他们恶心。

作为总统,希拉克曾在国际舞台上强硬推销法国的立场。最令人难忘的应当是2003年,希拉克坚决反对以美国为首的盟军入侵伊拉克。

希拉克坚决反对法国参与军事行动的立场激怒了不少美国高层,也给他和时任英国首相布莱尔之间的关系带来长期影响。

但是希拉克坚持己见,他在2004年接受BBC采访时曾说,“在这件事情上,美国有自己的立场,美国总统说他不会改变他的立场,我完全理解。法国也有自己的立场,法国也不会改变自己的立场。”

他还说,“这并不意味着我们不尊重对方。”

对伊拉克战争说“不”让希拉克赢得了国人的尊重,但他给继任留下的是一个脆弱的法美关系。